वायु में ऑक्सीजन की मात्रा जल में घुली ऑक्सीजन की तुलना में बहुत अधिक होती है।
इसलिए स्थलीय जीव को उतनी ही ऑक्सीजन पाने के लिए कहीं कम प्रयास करना पड़ता है।
उत्तर: वायु में अधिक ऑक्सीजन उपलब्ध होने के कारण स्थलीय जीव लाभप्रद स्थिति में हैं; इसीलिए जलीय जीवों की श्वसन दर स्थलीय जीवों से तेज़ होती है।
ऑक्सीजन का वहन श्वसन वर्णक हीमोग्लोबिन करता है, जो लाल रुधिर कणिकाओं में उपस्थित होता है और ऑक्सीजन के लिए उच्च बंधुता रखता है।
कार्बन डाइऑक्साइड जल में अधिक विलेय है, इसलिए उसे किसी वर्णक की आवश्यकता नहीं पड़ती।
उत्तर: ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन से जुड़कर ऊतकों तक पहुँचती है, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड रुधिर में विलेय अवस्था में फुफ्फुस तक लाई जाती है।
फुफ्फुस के भीतर वायु मार्ग छोटी-छोटी नलियों में बँटकर अंत में गुब्बारे जैसी कूपिकाओं में खुलता है।
कूपिकाओं की संख्या बहुत अधिक होती है—यदि उनकी सतह फैला दी जाए तो वह लगभग 80 वर्ग मीटर क्षेत्र ढक लेगी।
उनकी भित्ति बहुत पतली होती है और उसमें रुधिर वाहिकाओं का विस्तृत जाल होता है।
उत्तर: असंख्य पतली भित्ति वाली कूपिकाएँ और उनके चारों ओर फैला रुधिर जाल मिलकर विनिमय के लिए विशाल क्षेत्रफल उपलब्ध कराते हैं।
पहला चरण तीनों पथों में एक ही है—कोशिकाद्रव्य में छह कार्बन वाला ग्लूकोज़ टूटकर तीन कार्बन वाला पाइरुवेट बनाता है।
ऑक्सीजन की उपस्थिति में पाइरुवेट माइटोकॉन्ड्रिया में जाकर कार्बन डाइऑक्साइड और जल में टूटता है और बहुत अधिक ऊर्जा देता है—यह वायवीय श्वसन है।
यीस्ट में ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में पाइरुवेट एथनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड में बदल जाता है; इसे किण्वन कहते हैं।
हमारी पेशियों में ऑक्सीजन की कमी होने पर पाइरुवेट लैक्टिक अम्ल में बदल जाता है, जिससे ऐंठन होती है।
उत्तर: तीन पथ हैं—वायवीय श्वसन (CO₂ और जल), यीस्ट में किण्वन (एथनॉल और CO₂) तथा पेशियों में अवायवीय श्वसन (लैक्टिक अम्ल)।