परागण में परागकण परागकोश से स्त्रीकेसर के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं; यह केवल एक स्थानांतरण है और वायु, जल या कीटों द्वारा होता है।
निषेचन में नर युग्मक और अंडकोशिका का संलयन होता है, जो अंडाशय के भीतर बीजांड में होता है।
उत्तर: परागण पहले होता है और निषेचन उसके बाद; परागण के बिना निषेचन नहीं होगा और निषेचन के बिना बीज नहीं बनेगा।
ये ग्रंथियाँ शुक्राणुओं के मार्ग में अपना स्राव मिला देती हैं।
इससे शुक्राणु एक द्रव माध्यम में आ जाते हैं, जिससे उनका स्थानांतरण सरल हो जाता है।
उत्तर: यह स्राव शुक्राणुओं को पोषण भी देता है, जिससे उनकी गति बनी रहती है। स्थानांतरण आसान बनाना और पोषण देना—यही इनकी भूमिका है।
स्तनों के आकार में वृद्धि होती है और स्तनाग्र की त्वचा का रंग गहरा होने लगता है।
जनन अंगों के आसपास और बगल में बाल आ जाते हैं, तथा त्वचा तेलीय हो जाने से कभी-कभी मुँहासे निकल आते हैं।
उत्तर: इसके साथ ऋतुस्राव आरंभ हो जाता है, जो इस बात का संकेत है कि अंडाशय परिपक्व अंड छोड़ने लगे हैं।
भ्रूण गर्भाशय की भित्ति में धँस जाता है और वहाँ प्लेसेंटा नामक विशेष ऊतक बनता है।
प्लेसेंटा में भ्रूण की ओर प्रवर्ध होते हैं और माँ की ओर रुधिर रिक्तिकाएँ, जिससे सतही क्षेत्रफल बहुत बढ़ जाता है।
इसी से ग्लूकोज़ और ऑक्सीजन माँ के रुधिर से भ्रूण तक पहुँचते हैं।
उत्तर: भ्रूण के वर्ज्य पदार्थ भी इसी प्लेसेंटा द्वारा माँ के रुधिर में चले जाते हैं, जहाँ से वे बाहर निकाल दिए जाते हैं।
कॉपर-टी गर्भाशय में लगाई जाने वाली युक्ति है, जो केवल गर्भधारण रोकती है।
यौन संचारित रोग शारीरिक संपर्क से फैलते हैं और कॉपर-टी इस संपर्क में कोई अवरोध नहीं बनाती।
उत्तर: नहीं, कॉपर-टी यौन संचारित रोगों से रक्षा नहीं करेगी। इसके लिए कंडोम जैसे यांत्रिक अवरोध ही उपयोगी हैं।