आहार शृंखला के प्रत्येक चरण को पोषी स्तर कहते हैं।
उदाहरण: घास → टिड्डा → मेंढक → साँप।
घास उत्पादक और पहला पोषी स्तर है; टिड्डा प्राथमिक उपभोक्ता और दूसरा स्तर है।
मेंढक द्वितीयक उपभोक्ता और तीसरा स्तर है; साँप तृतीयक उपभोक्ता और चौथा स्तर है।
नियम—एक पोषी स्तर की लगभग 10% ऊर्जा ही अगले पोषी स्तर तक पहुँचती है।
प्राथमिक उपभोक्ता की ऊर्जा = 20,000 × 10/100 = 2,000 J।
द्वितीयक उपभोक्ता की ऊर्जा = 2,000 × 10/100 = 200 J।
अंतिम उत्तर: द्वितीयक उपभोक्ता को लगभग 200 J ऊर्जा मिलेगी।
हर पोषी स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा का लगभग 90% जीवन क्रियाओं और ऊष्मा के रूप में खर्च हो जाता है।
अगले स्तर तक केवल लगभग 10% ऊर्जा पहुँचती है।
तीन-चार स्थानांतरण के बाद इतनी कम ऊर्जा बचती है कि वह एक और बड़ी जीव संख्या को सहारा नहीं दे सकती।
उत्तर: हर स्तर पर ऊर्जा की भारी कमी के कारण आहार शृंखला छोटी रहती है।
उस स्तर को भोजन बनाने वाले जीवों की संख्या बढ़ सकती है, क्योंकि उन्हें खाने वाला जीव नहीं रहेगा।
उस स्तर पर निर्भर अगले उपभोक्ताओं को भोजन नहीं मिलेगा, इसलिए उनकी संख्या घटेगी या वे स्थान बदलेंगे।
उदाहरण के लिए घास → हिरण → बाघ में सभी हिरण हटें तो घास बढ़ सकती है, पर बाघों को भोजन नहीं मिलेगा।
आहार जाल की दूसरी कड़ियाँ भी प्रभावित होंगी और पारितंत्र का संतुलन बिगड़ेगा।
उत्तर: किसी पूरे पोषी स्तर को हटाना अनेक जीवों की संख्या और ऊर्जा प्रवाह को बदल देता है।
प्रभाव समान नहीं होगा, क्योंकि हर स्तर की भूमिका और उससे जुड़े जीव अलग हैं।
उत्पादक हटें तो भोजन और ऊर्जा का मूल स्रोत समाप्त हो जाएगा, इसलिए लगभग पूरी आहार शृंखला टूट जाएगी।
शीर्ष उपभोक्ता हटें तो उनके शिकार की संख्या बहुत बढ़ सकती है और वनस्पति पर दबाव बढ़ सकता है।
अपघटक हटें तो मृत पदार्थ जमा होगा और पोषक तत्त्वों का पुनर्चक्रण रुक जाएगा।
निष्कर्ष: कोई भी पूरा पोषी स्तर बिना क्षति के नहीं हटाया जा सकता; पारितंत्र की स्थिरता सभी भूमिकाओं के संतुलन पर निर्भर है।
DDT जैसे कुछ अजैव निम्नीकरणीय रसायन जीव के शरीर में जमा होते हैं और आसानी से नष्ट या बाहर नहीं निकलते।
एक उपभोक्ता अनेक निचले स्तर के जीवों को खाता है, इसलिए उन सभी में जमा रसायन उसके शरीर में पहुँचता है।
आहार शृंखला में ऊपर जाते हुए रसायन की सांद्रता बढ़ने को जैव आवर्धन कहते हैं।
हाँ, प्रभाव अलग होता है—शीर्ष पोषी स्तर पर सांद्रता और हानि सामान्यतः सबसे अधिक होती है। मनुष्य भी अनेक आहार शृंखलाओं के शीर्ष पर हो सकता है।