वन अनेक पौधों, जंतुओं और सूक्ष्मजीवों का आवास हैं तथा आनुवंशिक और प्रजातीय जैव विविधता सुरक्षित रखते हैं।
पेड़ों की जड़ें मिट्टी कटाव रोकती हैं और वन वर्षाजल को जमीन में उतारकर जल स्रोतों को सहारा देते हैं।
वन कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते, जलवायु को संतुलित करते और ऑक्सीजन चक्र में योगदान देते हैं।
स्थानीय समुदाय को ईंधन, चारा, फल, औषधि और जीविका मिलती है।
निष्कर्ष: वन संरक्षण पारितंत्रीय स्थिरता और मानव जीवन, दोनों के लिए आवश्यक है।
अवैध और साफ कटाई रोकें तथा कटे पेड़ों के स्थान पर स्थानीय मिश्रित प्रजातियाँ लगाएँ।
वन के पास रहने वाले समुदाय को निर्णय, निगरानी और वन उपज के लाभ में भागीदार बनाएँ।
उद्योगों को कच्चे माल का दक्ष उपयोग, पुनर्चक्रण और नियोजित पुनरोपण अनिवार्य करें।
वनाग्नि, अति-चराई, शिकार, प्लास्टिक कचरा और अनियंत्रित पर्यटन को नियंत्रित करें।
वन्यजीव गलियारे और आवास बचाएँ तथा सड़क/बाँध जैसी परियोजनाओं का पर्यावरणीय आकलन करें।
स्थानीय समुदाय—ईंधन, चारा, फल, औषधि, छोटी लकड़ी और जीविका के लिए वन पर निर्भर है।
वन विभाग—वन का स्वामित्व, नियम, सुरक्षा और वन उपज का प्रबंधन करता है।
उद्योग—कागज, इमारती लकड़ी, बीड़ी और दूसरी वस्तुओं के लिए बड़े पैमाने पर कच्चा माल चाहता है।
वन्यजीव और प्रकृति प्रेमी—जैव विविधता और प्राकृतिक अवस्था का संरक्षण चाहते हैं।
उत्तर: सतत निर्णय में चारों की जरूरतें देखी जाएँ, पर वन और स्थानीय जीविका की दीर्घकालीन क्षमता नष्ट न हो।
1970 के दशक में गढ़वाल हिमालय के रेनी गाँव के पास ठेकेदार को पेड़ काटने का अधिकार मिला।
जब कटाई करने वाले आए, गाँव की महिलाओं ने पेड़ों को बाँहों में पकड़कर कटने से बचाया। इसी कारण आंदोलन को चिपको कहा गया।
आंदोलन ने दिखाया कि स्थानीय लोगों के लिए वन जल, मिट्टी, चारा, ईंधन और जीविका का आधार है, केवल लकड़ी का बाजार नहीं।
सीख: स्थानीय समुदाय के ज्ञान, जरूरत और भागीदारी को वन प्रबंधन में प्राथमिक स्थान देना चाहिए।
पश्चिम बंगाल के अरबाड़ी में पुलिस आधारित नियंत्रण से ग्रामीणों और वन विभाग के बीच संघर्ष था।
वन अधिकारी ए. के. बनर्जी ने ग्रामीणों को 1,272 हेक्टेयर क्षतिग्रस्त साल वन की सुरक्षा में भागीदार बनाया।
उन्हें रोजगार, कम मूल्य पर ईंधन/चराई और वन उपज का 25% हिस्सा मिला।
लाभ और जिम्मेदारी साथ मिलने पर समुदाय ने वन की रक्षा की और 1983 तक वन फिर समृद्ध हो गया।
निष्कर्ष: भागीदारी और न्यायपूर्ण लाभ-साझेदारी संरक्षण को टिकाऊ बनाते हैं।