द्विखंडन में एक कोशिका विभाजित होकर केवल दो संतति कोशिकाएँ बनाती है, जैसे अमीबा और लेश्मानिया में।
बहुखंडन में एक ही कोशिका एक साथ अनेक संतति कोशिकाओं में बँट जाती है, जैसे मलेरिया परजीवी प्लैज्मोडियम में।
उत्तर: अंतर बनने वाली संतति की संख्या का है—द्विखंडन में दो और बहुखंडन में एक साथ अनेक।
बीजाणु के चारों ओर मोटी भित्ति होती है, जो उसे सूखे और प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाती है।
वे बहुत हल्के होते हैं, इसलिए हवा के साथ दूर-दूर तक फैल जाते हैं और नई जगह पहुँच जाते हैं।
नम सतह के संपर्क में आते ही वे वृद्धि करने लगते हैं और नए जीव बना देते हैं।
उत्तर: सुरक्षा, आसान फैलाव और अनुकूल समय की प्रतीक्षा कर सकने की क्षमता—यही तीन लाभ बीजाणु से मिलते हैं।
जटिल जीवों का शरीर अंगों और ऊतकों के सुव्यवस्थित तंत्र से बना होता है और हर अंग का काम अलग होता है।
उनकी कोशिकाएँ विभेदित हो चुकी होती हैं, इसलिए वे किसी भी प्रकार के ऊतक में नहीं बदल सकतीं।
किसी एक अंग का टुकड़ा अकेले पूरा शरीर नहीं बना सकता, क्योंकि उसमें शेष सभी तंत्र नहीं होते।
उत्तर: इसी कारण जटिल जीवों में जनन के लिए विशेष जनन कोशिकाएँ और विशेष जनन अंग होते हैं, और पुनरुद्भवन से नई संतति नहीं बनती।
केला, संतरा, गुलाब और चमेली जैसे पौधे या तो बीज नहीं बनाते या उनके बीज जीवनक्षम नहीं होते।
इस विधि से बने पौधे जनक के समान होते हैं, इसलिए फल और फूल की गुणवत्ता वही बनी रहती है।
ये पौधे बीज से उगाए गए पौधों की तुलना में कम समय में फल देने लगते हैं।
उत्तर: बीज की समस्या, जनक जैसी गुणवत्ता और जल्दी फल—इन तीन कारणों से कायिक प्रवर्धन का उपयोग किया जाता है।
जनन का अर्थ ही है जनक जैसा नया जीव बनाना, और वह अभिकल्प डी.एन.ए. में लिखा होता है।
यदि प्रतिकृति न बने तो संतति कोशिका को यह सूचना नहीं मिलेगी और वह ठीक से बन ही नहीं पाएगी।
उत्तर: डी.एन.ए. प्रतिकृति से ही स्पीशीज़ के लक्षण पीढ़ी-दर-पीढ़ी बने रहते हैं, इसलिए यह जनन के लिए आवश्यक है।