भौगोलिक पार्थक्य, जैसे विशाल नदी या पर्वत, दोनों समष्टियों के बीच जीन-प्रवाह रोक देता है।
अलग हुई समष्टियों में आनुवंशिक विचलन अलग-अलग परिवर्तन जोड़ता जाता है।
दोनों जगह प्राकृतिक चयन भी भिन्न दिशा में काम करता है, क्योंकि परभक्षी और परिस्थितियाँ अलग होती हैं।
उत्तर: अंततः डी.एन.ए. में इतना परिवर्तन आ जाता है कि दोनों समष्टियों के युग्मक संलयन नहीं कर पाते और नई स्पीशीज़ बन जाती है।
स्वपरागण में परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं, इसलिए जनन के लिए दूसरे पौधे की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
ऐसी स्थिति में दो समष्टियों के बीच वैसे भी कोई उल्लेखनीय जीन-प्रवाह नहीं हो रहा था, जिसे पृथक्करण रोक सके।
उत्तर: नहीं, स्वपरागित पौधों में भौगोलिक पृथक्करण जाति-उद्भव का प्रमुख कारण नहीं हो सकता, क्योंकि उनका जनन पहले से ही स्वतंत्र है।
अलैंगिक जनन में केवल एक ही जीव भाग लेता है और संतति उसी के डी.एन.ए. से बनती है।
इसलिए दो समष्टियों के बीच जीन-प्रवाह होता ही नहीं, जिसे भौगोलिक पृथक्करण रोक सके।
उनमें विभिन्नता केवल डी.एन.ए. की प्रतिकृति में होने वाली त्रुटियों से आती है, जो पृथक्करण पर निर्भर नहीं है।
उत्तर: नहीं, अलैंगिक जनन वाले जीवों में भौगोलिक पृथक्करण जाति उद्भव का प्रमुख कारक नहीं हो सकता।