बिंब के हर बिंदु से निकली किरणें लेंस के पूरे पृष्ठ पर पड़ती हैं, किसी एक भाग पर नहीं।
आधा भाग ढक देने पर लेंस तक पहुँचने वाली किरणों की संख्या आधी रह जाती है, पर जो किरणें जाती हैं वे उसी बिंदु पर मिलती हैं।
प्रयोग में यही दिखता है—परदे पर प्रतिबिंब पूरा बनता है, बस कुछ मंद पड़ जाता है।
उत्तर: हाँ, पूरा प्रतिबिंब बनेगा, पर वह पहले से कम चमकीला होगा, क्योंकि अब उसे बनाने में कम प्रकाश भाग ले रहा है।
उत्तल दर्पण की फोकस दूरी धनात्मक होती है, इसलिए f = +15 cm और u = −10 cm।
दर्पण सूत्र 1/v + 1/u = 1/f से 1/v = 1/f − 1/u = 1/15 + 1/10।
1/v = (2 + 3)/30 = 5/30 = 1/6, इसलिए v = +6 cm।
आवर्धन m = −v/u = −6/(−10) = +0.6, जो धनात्मक और एक से कम है।
उत्तर: प्रतिबिंब दर्पण के पीछे 6 cm दूरी पर बनेगा और वह आभासी, सीधा तथा बिंब से छोटा होगा।
अवतल दर्पण सीधा प्रतिबिंब केवल तभी बनाता है जब बिंब ध्रुव तथा मुख्य फोकस के बीच रखा हो।
यहाँ फोकस दूरी 15 cm है, इसलिए बिंब की दूरी 0 से 15 cm के बीच होनी चाहिए।
ऐसी स्थिति में प्रतिबिंब आभासी तथा सीधा बनता है और दर्पण के पीछे बनता है।
प्रतिबिंब का आकार बिंब से बड़ा, यानी आवर्धित होता है।
किरण आरेख में दो किरणें खींचिए—एक मुख्य अक्ष के समांतर, जो परावर्तन के बाद फोकस से होकर जाती है, और दूसरी वक्रता केंद्र की ओर जाती हुई, जो उसी राह लौट आती है।
उत्तर: बिंब को दर्पण से 15 cm से कम दूरी पर रखना चाहिए; प्रतिबिंब आभासी, सीधा और बिंब से बड़ा बनेगा। परावर्तित किरणों को पीछे बढ़ाने पर वे दर्पण के पीछे जहाँ मिलती दिखें, वहीं प्रतिबिंब होगा।
कार के अग्र-दीप में अवतल दर्पण लगता है। बल्ब को उसके फोकस पर रखने से परावर्तन के बाद समांतर किरण-पुंज निकलता है, जो दूर तक प्रकाश फेंकता है।
वाहन के पार्श्व अथवा पश्च-दृश्य दर्पण के रूप में उत्तल दर्पण लगता है, क्योंकि वह सदा सीधा प्रतिबिंब बनाता है और उसका दृष्टि-क्षेत्र बड़ा होता है।
सौर भट्टी में अवतल दर्पण लगता है, क्योंकि वह सूर्य की समांतर किरणों को एक ही बिंदु पर केंद्रित कर देता है, जिससे वहाँ बहुत अधिक ताप उत्पन्न हो जाता है।
उत्तर: अग्र-दीप और सौर भट्टी में अवतल दर्पण, तथा पश्च-दृश्य दर्पण के रूप में उत्तल दर्पण प्रयुक्त होता है।
दिया है: h = +5 cm, u = −25 cm, f = +10 cm, क्योंकि अभिसारी यानी उत्तल लेंस की फोकस दूरी धनात्मक होती है।
लेंस सूत्र 1/v − 1/u = 1/f से 1/v = 1/f + 1/u = 1/10 − 1/25।
1/v = (5 − 2)/50 = 3/50, इसलिए v = 50/3 ≈ +16.7 cm।
आवर्धन m = v/u = 16.7/(−25) ≈ −0.67, इसलिए h′ = m × h ≈ −3.3 cm।
किरण आरेख में एक किरण मुख्य अक्ष के समांतर खींचिए, जो अपवर्तन के बाद F₂ से होकर जाएगी, और दूसरी प्रकाशिक केंद्र से, जो सीधी निकलेगी।
उत्तर: प्रतिबिंब लेंस के दूसरी ओर लगभग 16.7 cm दूर बनेगा; यह वास्तविक, उलटा और लगभग 3.3 cm लंबा, यानी बिंब से छोटा होगा।
अवतल लेंस की फोकस दूरी ऋणात्मक होती है, इसलिए f = −15 cm। अवतल लेंस का प्रतिबिंब सदा आभासी होता है, इसलिए v = −10 cm।
लेंस सूत्र 1/v − 1/u = 1/f से 1/u = 1/v − 1/f = 1/(−10) − 1/(−15)।
1/u = −1/10 + 1/15 = (−3 + 2)/30 = −1/30, इसलिए u = −30 cm।
ऋण चिह्न बताता है कि बिंब लेंस के बाईं ओर है, जैसा होना ही चाहिए।
किरण आरेख में अपवर्तित किरणों को पीछे की ओर बढ़ाइए; वे जहाँ मिलती प्रतीत हों, वहीं आभासी प्रतिबिंब बनेगा।
उत्तर: बिंब लेंस से 30 cm की दूरी पर स्थित है।