पास की वस्तु देखने के लिए पक्ष्माभी पेशियों को सिकुड़कर अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी घटानी पड़ती है।
पर फोकस दूरी घटाने की भी एक सीमा होती है; उससे आगे पेशियाँ और सिकुड़ नहीं सकतीं।
इसलिए 25 cm से निकट रखी वस्तु का प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर नहीं बन पाता और वस्तु धुँधली दिखाई देती है।
उत्तर: समंजन की सीमा होने के कारण सामान्य नेत्र 25 cm से निकट रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट नहीं देख पाते; यही दूरी सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी कहलाती है।
नेत्र में प्रतिबिंब सदा दृष्टिपटल पर ही बनता है, और दृष्टिपटल की दूरी नियत रहती है।
वस्तु दूर हटने पर पक्ष्माभी पेशियाँ लेंस को पतला कर देती हैं, जिससे फोकस दूरी बढ़ जाती है।
इसी समायोजन के कारण प्रतिबिंब फिर भी दृष्टिपटल पर ही बना रहता है।
उत्तर: प्रतिबिंब-दूरी में कोई परिवर्तन नहीं होता; वह नियत रहती है, केवल लेंस की फोकस दूरी बदल जाती है।
तारे बहुत दूर हैं, इसलिए वे बिंदु स्रोत की तरह व्यवहार करते हैं।
उनका प्रकाश वायुमंडल की भिन्न-भिन्न अपवर्तनांक वाली बदलती परतों से गुजरते समय लगातार थोड़ा-थोड़ा मुड़ता रहता है।
इससे तारे की आभासी स्थिति भी बदलती रहती है और नेत्र तक पहुँचने वाले प्रकाश की मात्रा भी।
उत्तर: कभी अधिक और कभी कम प्रकाश पहुँचने के कारण तारा टिमटिमाता हुआ दिखाई देता है; यह वायुमंडलीय अपवर्तन का परिणाम है।
ग्रह पृथ्वी के अपेक्षाकृत निकट हैं, इसलिए वे बिंदु स्रोत न होकर अनेक बिंदु स्रोतों का संग्रह हैं।
हर बिंदु से आने वाले प्रकाश में वायुमंडल अलग-अलग परिवर्तन करता है, पर ये परिवर्तन आपस में रद्द हो जाते हैं।
उत्तर: नेत्र तक पहुँचने वाली कुल प्रकाश की मात्रा औसत रूप से स्थिर रहती है, इसलिए ग्रह टिमटिमाते नहीं।
क्षितिज के समीप स्थित सूर्य का प्रकाश हमारे नेत्रों तक पहुँचने से पहले वायुमंडल की मोटी परतों से होकर गुजरता है।
इतनी लंबी यात्रा में नीले तथा कम तरंगदैर्ध्य वाले प्रकाश का अधिकांश भाग कणों द्वारा प्रकीर्ण हो जाता है।
इसलिए हमारे नेत्रों तक मुख्यतः अधिक तरंगदैर्ध्य वाला लाल प्रकाश ही पहुँच पाता है।
उत्तर: इसी कारण सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य रक्ताभ प्रतीत होता है, जबकि दोपहर में वह श्वेत दिखाई देता है।
आकाश का नीला रंग वायुमंडल के सूक्ष्म कणों द्वारा नीले प्रकाश के प्रकीर्णन का परिणाम है।
अंतरिक्ष में वायुमंडल नहीं होता, इसलिए वहाँ प्रकीर्णन करने वाले कण ही नहीं हैं।
उत्तर: प्रकीर्णन न होने से चारों ओर से कोई प्रकाश नेत्र तक नहीं पहुँचता, इसलिए अंतरिक्षयात्री को आकाश काला प्रतीत होता है।