स्वपोषी पोषण में जीव पर्यावरण से सरल अकार्बनिक पदार्थ—कार्बन डाइऑक्साइड और जल—लेकर स्वयं अपना भोजन बना लेते हैं, और इसके लिए उन्हें सूर्य के प्रकाश तथा पर्णहरित की आवश्यकता होती है।
विषमपोषी पोषण में जीव स्वयं भोजन नहीं बना सकते; वे दूसरे जीवों द्वारा तैयार किए गए जटिल पदार्थों का अंतर्ग्रहण करते हैं और उन्हें एंजाइम से तोड़ते हैं।
उत्तर: स्वपोषी भोजन बनाते हैं और विषमपोषी भोजन लेते हैं। हरे पौधे स्वपोषी हैं, जबकि जंतु और कवक विषमपोषी।
कार्बन डाइऑक्साइड पत्तियों की सतह पर बने सूक्ष्म छिद्रों, यानी रंध्रों से ली जाती है।
जल मिट्टी से जड़ों द्वारा अवशोषित होकर जाइलम से पत्तियों तक पहुँचता है।
उत्तर: CO₂ वायु से रंध्रों द्वारा और जल तथा नाइट्रोजन, फॉस्फोरस जैसे खनिज मिट्टी से जड़ों द्वारा प्राप्त होते हैं।
आमाशय की जठर ग्रंथियाँ हाइड्रोक्लोरिक अम्ल स्रावित करती हैं।
यह अम्ल माध्यम को अम्लीय बना देता है, जो पेप्सिन एंजाइम के काम करने के लिए आवश्यक है।
उत्तर: अम्ल पेप्सिन के लिए उपयुक्त अम्लीय माध्यम बनाता है और भोजन के साथ आए जीवाणुओं को भी मार देता है। श्लेष्मा आमाशय की भीतरी परत को इसी अम्ल से बचाता है।
भोजन में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा जटिल रूप में होते हैं, जिन्हें कोशिकाएँ सीधे नहीं ले सकतीं।
पाचक एंजाइम इन जटिल पदार्थों को सरल और घुलनशील रूप में तोड़ देते हैं।
उत्तर: एंजाइम कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज़ में, प्रोटीन को अमीनो अम्ल में तथा वसा को वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में बदल देते हैं, ताकि वे आँत की भित्ति से अवशोषित हो सकें।
क्षुद्रांत्र के आंतरिक आस्तर पर अनेक अँगुली जैसे प्रवर्ध होते हैं, जिन्हें दीर्घरोम कहते हैं।
ये अवशोषण का सतही क्षेत्रफल बहुत बढ़ा देते हैं।
दीर्घरोम में रुधिर वाहिकाओं की बहुतायत होती है, जो अवशोषित भोजन को तुरंत शरीर की हर कोशिका तक पहुँचा देती हैं।
उत्तर: बढ़ा हुआ सतही क्षेत्रफल और रुधिर वाहिकाओं की निकटता—दोनों मिलकर क्षुद्रांत्र को अवशोषण के लिए उपयुक्त बनाते हैं।