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आज क्या सीखेंगे
भोजन नली के हर भाग में होने वाले पाचन और वहाँ काम करने वाले एंजाइम बताना।
📖 उदाहरण से समझें (Learn with an Example)
रोटी को देर तक चबाइए तो वह मीठी लगने लगती है। यह मिठास कहीं बाहर से नहीं आई—लार ने स्टार्च को शर्करा में बदलना शुरू कर दिया।
पाचन मुँह से ही शुरू हो जाता है और क्षुद्रांत्र तक चलता रहता है।
🧠 समझिए (Understand)
मुँह में लार ग्रंथियाँ लार स्रावित करती हैं, जिसमें लार ऐमिलेज़ एंजाइम होता है। यह स्टार्च जैसे जटिल कार्बोहाइड्रेट को शर्करा में तोड़ता है।
आमाशय की भित्ति की जठर ग्रंथियाँ हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, पेप्सिन एंजाइम तथा श्लेष्मा स्रावित करती हैं।
अम्ल माध्यम को अम्लीय बनाता है ताकि पेप्सिन काम कर सके, और वह भोजन के साथ आए जीवाणुओं को भी मार देता है। श्लेष्मा आमाशय की भीतरी परत को अम्ल से बचाता है।
क्षुद्रांत्र कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा वसा के पूर्ण पाचन का स्थल है। यहाँ यकृत से पित्तरस और अग्न्याशय से अग्न्याशयिक रस आता है।
आमाशय से आने वाला भोजन अम्लीय होता है; पित्तरस उसे क्षारीय बना देता है ताकि अग्न्याशयिक एंजाइम काम कर सकें। पित्त लवण वसा की बड़ी गोलिकाओं को छोटी गोलिकाओं में तोड़ देते हैं, जिसे इमल्सीकरण कहते हैं।
अग्न्याशयिक रस में प्रोटीन के पाचन के लिए ट्रिप्सिन और इमल्सीकृत वसा के पाचन के लिए लाइपेज़ होता है।
क्षुद्रांत्र की भित्ति में आंत्र रस होता है, जो प्रोटीन को अमीनो अम्ल में, जटिल कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज़ में तथा वसा को वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में बदल देता है।
क्षुद्रांत्र के आंतरिक आस्तर पर अँगुली जैसे प्रवर्ध होते हैं, जिन्हें दीर्घरोम (Villi) कहते हैं। ये अवशोषण का सतही क्षेत्रफल बढ़ा देते हैं और इनमें रुधिर वाहिकाओं की बहुतायत होती है।
बिना पचा भोजन बृहदांत्र में जाता है, जहाँ दीर्घरोम जल का अवशोषण कर लेते हैं और शेष पदार्थ गुदा द्वारा बाहर कर दिया जाता है।
भोजन के रास्ते के साथ देखें कि पाचन कहाँ शुरू होता है, कहाँ पूरा होता है और सहायक रस कहाँ मिलते हैं।
✍️ कैसे करें (How to solve)
पहले बताइए भोजन शरीर के किस भाग में है।
वहाँ कौन सा रस या एंजाइम आता है, यह लिखिए।
फिर बताइए कौन सा पोषक पदार्थ किसमें बदला।
उदाहरण 1 (Example 1) — वसा का पाचन
हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे और कहाँ होता है?
वसा का पाचन क्षुद्रांत्र में होता है।
क्षुद्रांत्र में वसा बड़ी गोलिकाओं के रूप में आती है, जिस पर एंजाइम आसानी से काम नहीं कर पाते।
यकृत से आया पित्त लवण इन्हें छोटी-छोटी गोलिकाओं में तोड़ देता है, जिससे एंजाइम की क्रियाशीलता बढ़ जाती है—यही इमल्सीकरण है।
फिर अग्न्याशय का लाइपेज़ एंजाइम इमल्सीकृत वसा को वसा अम्ल और ग्लिसरॉल में बदल देता है।
वसा का पाचन क्षुद्रांत्र में पित्त लवण और लाइपेज़ की संयुक्त क्रिया से होता है।
उदाहरण 2 (Example 2) — दीर्घरोम का महत्व
पचे हुए भोजन को अवशोषित करने के लिए क्षुद्रांत्र कैसे अभिकल्पित है?
क्षुद्रांत्र के भीतरी आस्तर पर अनगिनत अँगुली जैसे प्रवर्ध होते हैं, जिन्हें दीर्घरोम कहते हैं।
ये अवशोषण का सतही क्षेत्रफल बहुत बढ़ा देते हैं।
हर दीर्घरोम में रुधिर वाहिकाओं की बहुतायत होती है, जो अवशोषित भोजन को तुरंत शरीर की हर कोशिका तक पहुँचा देती हैं।
बढ़ा हुआ क्षेत्रफल और रुधिर की निकटता—दोनों मिलकर अवशोषण को कुशल बनाते हैं।
⚠️ आम ग़लती (Common mistake)
प्रोटीन का पाचन मुँह से ही शुरू हो जाता है। ❌
मुँह में केवल लार ऐमिलेज़ होता है, जो स्टार्च पर काम करता है; प्रोटीन का पाचन आमाशय में पेप्सिन से शुरू होता है।
मुँह में स्टार्च का, आमाशय में प्रोटीन का और क्षुद्रांत्र में तीनों का पाचन होता है।
खुद जाँचें — 3 छोटे सवाल
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