अतिरिक्त जल से वे वाष्पोत्सर्जन द्वारा छुटकारा पा लेते हैं।
बहुत से अपशिष्ट उत्पाद कोशिकीय रिक्तिका में संचित रहते हैं।
अन्य अपशिष्ट रेजिन तथा गोंद के रूप में विशेष रूप से पुराने जाइलम में संचित रहते हैं, और गिरने वाली पत्तियों में भी अपशिष्ट चले जाते हैं।
उत्तर: वाष्पोत्सर्जन, कोशिकीय रिक्तिका में संचयन, गोंद-रेजिन के रूप में जमा होना, पत्तियों का गिरना तथा आसपास की मृदा में उत्सर्जन—ये पादपों की मुख्य विधियाँ हैं।
मूत्र की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि शरीर में कितना अतिरिक्त जल है।
यह इस पर भी निर्भर करती है कि कितने घुलनशील वर्ज्य पदार्थ, जैसे यूरिया, शरीर से निकालने हैं।
नलिका में पुनरावशोषण के समय शरीर आवश्यकता के अनुसार जल वापस ले लेता है।
उत्तर: शरीर में उपलब्ध अतिरिक्त जल और निकाले जाने वाले वर्ज्य पदार्थों की मात्रा—इन्हीं दो बातों से मूत्र की मात्रा का नियमन होता है।
वृक्काणु वृक्क की आधारी निस्यंदन इकाई है और हर वृक्क में ऐसे अनेक वृक्काणु होते हैं।
हर वृक्काणु में पतली भित्ति वाली रुधिर केशिकाओं का एक गुच्छ होता है, जो एक नलिका के कप के आकार के सिरे के भीतर रहता है।
पहले चरण में रुधिर से जल, ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण तथा यूरिया सब छन जाते हैं।
दूसरे चरण में निस्यंद नलिका में आगे बढ़ता है और ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण तथा अधिकांश जल वापस रुधिर में अवशोषित कर लिए जाते हैं।
उत्तर: बचा हुआ द्रव मूत्र है, जो संग्रह नलिका से मूत्रवाहिनी होते हुए मूत्राशय तक पहुँचता है। छानना और फिर काम की चीज़ वापस लेना—यही वृक्काणु की पूरी क्रियाविधि है।