कूपिकाएँ गुब्बारे जैसी रचनाएँ हैं और उनकी संख्या बहुत अधिक होती है, जिससे विनिमय का सतही क्षेत्रफल बहुत बढ़ जाता है।
उनकी भित्ति बहुत पतली होती है, इसलिए गैसें आसानी से आर-पार जा सकती हैं।
भित्ति में रुधिर वाहिकाओं का विस्तृत जाल होता है।
उत्तर: विशाल सतही क्षेत्रफल, पतली भित्ति और रुधिर वाहिकाओं की निकटता—तीनों मिलकर कूपिकाओं को गैसों के विनिमय के लिए आदर्श बनाते हैं।
हीमोग्लोबिन ही ऑक्सीजन को फुफ्फुस से शरीर के ऊतकों तक पहुँचाता है।
उसकी कमी होने पर ऊतकों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती।
उत्तर: ऑक्सीजन की कमी से थकान, कमज़ोरी, साँस फूलना और त्वचा का पीला पड़ना होता है। इस स्थिति को रक्ताल्पता (Anaemia) कहते हैं।
जाइलम जल और घुले खनिज लवण ले जाता है, जबकि फ्लोएम पत्तियों में बना भोजन।
जाइलम में परिवहन केवल ऊपर की दिशा में होता है, जबकि फ्लोएम दोनों दिशाओं में काम करता है।
जाइलम में वाष्पोत्सर्जन खिंचाव से परिवहन होता है और इसके लिए अलग से ऊर्जा नहीं लगती; फ्लोएम में स्थानांतरण के लिए ATP खर्च होती है।
उत्तर: पदार्थ, दिशा और ऊर्जा—तीनों बातों में दोनों अलग हैं।
वायवीय श्वसन ऑक्सीजन की उपस्थिति में माइटोकॉन्ड्रिया में होता है और इसके अंत-उत्पाद कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल हैं।
अवायवीय श्वसन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में कोशिकाद्रव्य में होता है और अंत-उत्पाद एथनॉल तथा CO₂, या लैक्टिक अम्ल होते हैं।
वायवीय श्वसन में ग्लूकोज़ पूरी तरह टूटता है, इसलिए उससे कहीं अधिक ऊर्जा मिलती है।
उत्तर: यीस्ट तथा कुछ जीवाणुओं में अवायवीय श्वसन होता है। हमारी पेशियों में भी ऑक्सीजन की कमी होने पर अवायवीय श्वसन होने लगता है, जिससे लैक्टिक अम्ल बनता है और ऐंठन होती है।
एक पूरे चक्र में रुधिर दो बार हृदय से होकर गुज़रता है; इसी को दोहरा परिसंचरण कहते हैं।
पहली बार विऑक्सीजनित रुधिर दायें भाग से फुफ्फुस जाता है, वहाँ ऑक्सीजन लेकर वापस बायें भाग में आता है।
दूसरी बार वही ऑक्सीजनित रुधिर बायें निलय से पूरे शरीर में भेजा जाता है और फिर दायें अलिंद में लौटता है।
उत्तर: यह इसलिए आवश्यक है कि ऑक्सीजनित और विऑक्सीजनित रुधिर आपस में न मिलें। स्तनधारी और पक्षी शरीर का ताप स्थिर रखते हैं, जिसके लिए बहुत ऊर्जा और इसलिए पूरी ऑक्सीजन चाहिए।
दोनों अपने-अपने तंत्र की आधारी इकाई हैं—कूपिका गैसों के विनिमय की और वृक्काणु निस्यंदन की।
रचना में समानता यह है कि दोनों में पतली भित्ति होती है और दोनों के चारों ओर रुधिर केशिकाओं का विस्तृत जाल रहता है, जिससे विनिमय आसानी से हो सके।
क्रियाविधि में अंतर यह है कि कूपिका में गैसों का विनिमय होता है—ऑक्सीजन रुधिर में जाती है और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर आती है।
वृक्काणु में तरल छनता है और फिर ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण तथा अधिकांश जल वापस अवशोषित कर लिए जाते हैं।
उत्तर: बनावट का सिद्धांत दोनों में एक ही है—पतली भित्ति और अधिक सतह—पर कूपिका गैसों का विनिमय करती है जबकि वृक्काणु छानकर उपयोगी पदार्थ वापस लेता है।