पार्श्वक्रम में 1/Rₚ = 1/R₁ + 1/R₂ + … होता है और बड़े प्रतिरोधों का व्युत्क्रम बहुत छोटा होता है।
(a) में 1/Rₚ = 1/1 + 1/10⁶ ≈ 1, इसलिए Rₚ लगभग 1 Ω।
(b) में 1/Rₚ = 1/1 + 1/10³ + 1/10⁶ ≈ 1, इसलिए यहाँ भी Rₚ लगभग 1 Ω।
उत्तर: दोनों प्रकरणों में तुल्य प्रतिरोध लगभग 1 Ω रहेगा—यानी पार्श्वक्रम का कुल प्रतिरोध सबसे छोटे प्रतिरोध से भी कम, पर उसी के लगभग बराबर आता है।
पार्श्वक्रम में हर युक्ति को पूरा विभवांतर मिलता है, जबकि श्रेणीक्रम में वह बँट जाता है।
हर युक्ति को अपनी आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग धारा मिल जाती है, क्योंकि हर शाखा का प्रतिरोध अलग हो सकता है।
किसी एक युक्ति के खराब हो जाने पर शेष युक्तियाँ काम करती रहती हैं, क्योंकि उनका रास्ता अलग है।
उत्तर: इन्हीं कारणों से घरेलू परिपथों में पार्श्वक्रम संयोजन का उपयोग किया जाता है।
श्रेणीक्रम में प्रतिरोध जुड़ते जाते हैं, इसलिए वही अधिकतम प्रतिरोध देता है—Rꜱ = 4 + 8 + 12 + 24 = 48 Ω।
पार्श्वक्रम में कुल प्रतिरोध सबसे छोटे से भी कम हो जाता है, इसलिए वही निम्नतम देगा।
1/Rₚ = 1/4 + 1/8 + 1/12 + 1/24; समान हर 24 लेने पर (6 + 3 + 2 + 1)/24 = 12/24।
इससे Rₚ = 2 Ω।
उत्तर: (a) चारों को श्रेणीक्रम में जोड़ने पर अधिकतम 48 Ω, (b) चारों को पार्श्वक्रम में जोड़ने पर निम्नतम 2 Ω प्राप्त होगा।
तीनों युक्तियाँ पार्श्वक्रम में हैं, इसलिए 1/Rₚ = 1/100 + 1/50 + 1/500।
समान हर 500 लेने पर 1/Rₚ = (5 + 10 + 1)/500 = 16/500।
इससे Rₚ = 500/16 = 31.25 Ω।
इस्तरी को उतनी ही धारा लेनी है, इसलिए उसका प्रतिरोध भी 31.25 Ω होना चाहिए।
धारा I = V/R = 220 ÷ 31.25 = 7.04 A।
उत्तर: विद्युत इस्तरी का प्रतिरोध 31.25 Ω होगा और उससे लगभग 7.04 A धारा प्रवाहित होगी।
(a) के लिए 3 Ω तथा 6 Ω को पार्श्वक्रम में जोड़िए—1/R = 1/3 + 1/6 = 3/6, इसलिए R = 2 Ω।
अब इस 2 Ω के साथ शेष 2 Ω के प्रतिरोधक को श्रेणीक्रम में जोड़ दीजिए, जिससे कुल 2 + 2 = 4 Ω मिल जाएगा।
(b) के लिए तीनों को पार्श्वक्रम में जोड़िए—1/R = 1/2 + 1/3 + 1/6।
समान हर 6 लेने पर 1/R = (3 + 2 + 1)/6 = 6/6 = 1, इसलिए R = 1 Ω।
उत्तर: (a) 3 Ω और 6 Ω पार्श्वक्रम में, उसके बाद 2 Ω श्रेणीक्रम में; (b) तीनों पार्श्वक्रम में।