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आज क्या सीखेंगे
मूत्र बनने के चरण और वृक्काणु की क्रियाविधि बताना।
📖 उदाहरण से समझें (Learn with an Example)
रुधिर में लगातार यूरिया जैसे नाइट्रोजनी अपशिष्ट बनते रहते हैं। इन्हें छानकर बाहर करना जरूरी है।
यह काम वृक्क करते हैं, और वृक्क के भीतर असली छननी वृक्काणु है।
🧠 समझिए (Understand)
मानव उत्सर्जन तंत्र में एक जोड़ा वृक्क, एक मूत्रवाहिनी, एक मूत्राशय तथा एक मूत्रमार्ग होता है।
वृक्क उदर में रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर स्थित होते हैं। वृक्क में मूत्र बनने के बाद वह मूत्रवाहिनी से होते हुए मूत्राशय में आता है और वहीं तब तक एकत्र रहता है जब तक मूत्रमार्ग से निकल नहीं जाता।
वृक्क में आधारी निस्यंदन एकक को वृक्काणु (नेफ्रॉन) कहते हैं। हर वृक्क में ऐसे अनेक वृक्काणु होते हैं।
हर वृक्काणु में पतली भित्ति वाली रुधिर केशिकाओं का एक गुच्छ होता है, जो एक नलिका के कप के आकार के सिरे के भीतर रहता है।
पहले चरण में रुधिर से जल सहित अनेक पदार्थ छन जाते हैं, जिनमें ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण और यूरिया शामिल हैं।
दूसरे चरण में नलिका से होते हुए यह निस्यंद आगे बढ़ता है और शरीर के काम के पदार्थ—ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण तथा अधिकांश जल—वापस अवशोषित कर लिए जाते हैं।
बचा हुआ द्रव ही मूत्र है, जो संग्रह नलिका से होते हुए मूत्राशय तक पहुँचता है।
मूत्र की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि शरीर में कितना अतिरिक्त जल है और कितने घुलनशील वर्ज्य पदार्थ निकालने हैं।
छनना, फिर काम के पदार्थों का वापस अवशोषण, फिर मूत्र।
सूत्र (Formula)
छनना → पुनरावशोषण → मूत्र
✍️ कैसे करें (How to solve)
पहले बताइए रुधिर कहाँ छनता है।
फिर बताइए कौन से पदार्थ वापस अवशोषित होते हैं।
अंत में बचे हुए द्रव का रास्ता लिखिए।
उदाहरण 1 (Example 1) — वृक्काणु की क्रियाविधि
वृक्काणु में मूत्र कैसे बनता है?
केशिका गुच्छ में रुधिर उच्च दाब पर आता है और जल, ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण तथा यूरिया सब छन जाते हैं।
यह निस्यंद नलिका में आगे बढ़ता है, जहाँ ग्लूकोज़, अमीनो अम्ल, लवण और अधिकांश जल वापस रुधिर में अवशोषित कर लिए जाते हैं।
बचा हुआ द्रव, जिसमें मुख्यतः यूरिया और अतिरिक्त जल है, मूत्र के रूप में आगे बढ़ता है।
छानना और फिर काम की चीज़ वापस लेना—यही वृक्काणु की पूरी क्रियाविधि है।
उदाहरण 2 (Example 2) — कूपिका और वृक्काणु की तुलना
दोनों में क्या समानता है?
दोनों में पतली भित्ति वाली रुधिर केशिकाओं का विस्तृत जाल होता है, जिससे विनिमय आसानी से हो सके।
दोनों अपने-अपने तंत्र की आधारी इकाई हैं—कूपिका गैसों के विनिमय की और वृक्काणु निस्यंदन की।
अंतर यह है कि कूपिका में गैसों का विनिमय होता है, जबकि वृक्काणु में तरल छनता है और फिर उपयोगी पदार्थ वापस लिए जाते हैं।
बनावट का सिद्धांत एक है—पतली भित्ति और अधिक सतह; काम अलग-अलग हैं।
⚠️ आम ग़लती (Common mistake)
वृक्क केवल अतिरिक्त जल निकालते हैं। ❌
वृक्क का मुख्य काम रुधिर से नाइट्रोजनी वर्ज्य पदार्थ, जैसे यूरिया और यूरिक अम्ल, छानकर बाहर करना है।
वृक्क नाइट्रोजनी वर्ज्य पदार्थ और अतिरिक्त जल—दोनों निकालते हैं।
खुद जाँचें — 3 छोटे सवाल
पहले विकल्प चुनें। फिर उत्तर और उसका कारण देखें। यह समझ की जाँच है।