कुंडली A में धारा बदलने से उसके चारों ओर का चुंबकीय क्षेत्र भी बदल जाएगा।
कुंडली B पास में स्थित है, इसलिए उससे जुड़ा चुंबकीय क्षेत्र भी बदलेगा।
वैद्युतचुंबकीय प्रेरण के अनुसार क्षेत्र में परिवर्तन ही प्रेरित धारा का कारण है।
उत्तर: हाँ, कुंडली B में विद्युत धारा प्रेरित होगी, क्योंकि प्रेरण के लिए आपेक्षिक गति आवश्यक नहीं—क्षेत्र का बदलना ही पर्याप्त है।
जब परिपथ के विद्युन्मय तथा उदासीन तार सीधे एक-दूसरे के संपर्क में आ जाते हैं तब लघुपथन होता है।
ऐसा प्रायः तब होता है जब तारों का विद्युतरोधन क्षतिग्रस्त हो जाए अथवा किसी साधित्र में दोष आ जाए।
संपर्क होते ही परिपथ का प्रतिरोध लगभग शून्य हो जाता है और धारा अकस्मात बहुत अधिक हो जाती है।
उत्तर: इसी स्थिति को लघुपथन कहते हैं, और इससे बचाव के लिए परिपथ में उचित अनुमतांक का फ्यूज़ लगाया जाता है।
भूसंपर्क तार विद्युत धारा के लिए अल्प प्रतिरोध का चालन पथ प्रस्तुत करता है, जो सीधे भूमि तक जाता है।
यदि साधित्र के धात्विक आवरण में विद्युत धारा का कोई क्षरण हो जाए तो वह धारा इसी तार से होकर भूमि में चली जाती है।
इससे साधित्र के आवरण का विभव भूमि के विभव के बराबर बना रहता है।
उत्तर: इसी कारण साधित्र को छूने वाला व्यक्ति तीव्र विद्युत आघात से बचा रहता है—इसीलिए धातु के आवरण वाले विद्युत साधित्रों को भूसंपर्कित करना आवश्यक है।
(i) चुंबक को कुंडली में धकेलने पर उससे जुड़ा चुंबकीय क्षेत्र बदलता है, इसलिए कुंडली में धारा प्रेरित होती है और गैल्वेनोमीटर की सुई एक ओर विक्षेपित हो जाती है।
(ii) चुंबक को बाहर खींचने पर क्षेत्र फिर बदलता है, पर विपरीत प्रकार से; इसलिए सुई दूसरी ओर विक्षेपित होती है, यानी प्रेरित धारा की दिशा उलट जाती है।
(iii) चुंबक को भीतर स्थिर रखने पर आपेक्षिक गति नहीं होती, इसलिए कुंडली से जुड़ा क्षेत्र नहीं बदलता।
उत्तर: पहली दोनों स्थितियों में क्षणिक धारा प्रेरित होगी, पर तीसरी स्थिति में कोई धारा प्रेरित नहीं होगी और गैल्वेनोमीटर में कोई विक्षेप नहीं दिखेगा।
(i) दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम—तार को दाहिने हाथ में इस प्रकार पकड़िए कि अँगूठा धारा की दिशा में हो; तब मुड़ी हुई अँगुलियाँ चुंबकीय क्षेत्र की दिशा दर्शाती हैं।
(ii) फ्लेमिंग का वामहस्त नियम—बाएँ हाथ की तर्जनी क्षेत्र की दिशा, मध्यमा धारा की दिशा और अँगूठा बल की दिशा दर्शाता है।
(iii) फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम—दाहिने हाथ की तर्जनी क्षेत्र की दिशा, अँगूठा चालक की गति की दिशा और मध्यमा प्रेरित धारा की दिशा दर्शाती है।
उत्तर: तीनों नियमों में उँगलियाँ परस्पर लंबवत रखी जाती हैं; केवल यह याद रखिए कि बल के लिए बायाँ हाथ और प्रेरित धारा के लिए दाहिना हाथ लगता है।
आरेख में स्थायी चुंबक के दो ध्रुवों के बीच घूर्णी आयताकार कुंडली ABCD बनाइए, जिसके सिरे दो वलयों से जुड़े हों और उन पर दो स्थिर चालक ब्रुश दबे हों।
मूल सिद्धांत वैद्युतचुंबकीय प्रेरण है—कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाने पर उससे जुड़ा क्षेत्र बदलता रहता है और धारा प्रेरित हो जाती है।
कार्यविधि—धुरी को यांत्रिक रूप से घुमाने पर भुजा AB ऊपर और CD नीचे जाती है; फ्लेमिंग के दक्षिण-हस्त नियम से इनमें प्रेरित धारा की दिशा मिलती है।
हर आधे घूर्णन के बाद भुजाओं की स्थिति बदल जाती है, इसलिए धारा की दिशा भी बदल जाती है और प्रत्यावर्ती धारा मिलती है।
उत्तर: ब्रुशों का कार्य घूमती हुई कुंडली को स्थिर बाह्य परिपथ से जोड़े रखना है, ताकि प्रेरित धारा गैल्वेनोमीटर अथवा बाह्य परिपथ तक पहुँचती रहे।