वह प्रति एकांक आयतन अथवा द्रव्यमान अधिक कार्य करे, यानी उसका कैलोरी मान उच्च हो।
वह सरलता से सुलभ हो तथा उसका भंडारण और परिवहन आसान हो।
वह सस्ता हो, ताकि सब उसका उपयोग कर सकें।
उत्तर: सबसे महत्वपूर्ण यह कि उसके उपयोग से पर्यावरण को कम से कम क्षति पहुँचे—ये सभी गुण जिसमें हों वही ऊर्जा का आदर्श स्रोत है।
(a) पवनें—पवन ऊर्जा फार्म केवल उन्हीं स्थानों पर लग सकता है जहाँ वर्ष भर पवन चलती हो और उसकी चाल कम से कम 15 km/h हो; इसके लिए विशाल भूमि तथा भारी स्थापन लागत चाहिए और आँधी में पवनचक्की क्षतिग्रस्त हो सकती है।
(b) तरंगें—तरंग ऊर्जा का उपयोग केवल वहीं संभव है जहाँ तरंगें अत्यंत प्रबल हों, और उन्हें पकड़कर टरबाइन घुमाने वाली युक्तियाँ बनाना अभी बहुत महँगा है।
(c) ज्वार-भाटा—इसके लिए सँकरी खाड़ी के मुहाने पर बाँध बनाना पड़ता है; ऐसी उपयुक्त जगहें बहुत कम हैं और ज्वार-भाटे से मिलने वाली ऊर्जा की मात्रा भी सीमित रहती है।
उत्तर: तीनों की साझा सीमा यही है कि ऊर्जा उपलब्ध तो विशाल मात्रा में है, पर उसे सस्ते और दक्ष ढंग से निष्कर्षित करने की प्रौद्योगिकी अभी सीमित है।
(a) का आधार पुनर्जनन है—जिन स्रोतों का पुनर्जनन हो सकता है वे नवीकरणीय हैं, जैसे सौर, पवन, जल तथा जैवमात्रा; जिनका नहीं हो सकता वे अनवीकरणीय हैं, जैसे कोयला, पेट्रोलियम तथा यूरेनियम।
(b) का आधार यह है कि स्रोत कभी समाप्त होगा या नहीं—जो किसी न किसी दिन खत्म हो जाएँगे वे समाप्य हैं, और जिनके खत्म होने की चिंता व्यावहारिक रूप से नहीं है वे अक्षय, जैसे सौर ऊर्जा।
दोनों वर्गीकरण अधिकतर एक जैसे परिणाम देते हैं, पर पूरी तरह समान नहीं हैं।
उत्तर: जैवमात्रा नवीकरणीय होकर भी कुप्रबंधन से समाप्त हो सकती है, इसलिए दोनों विकल्पों को एक ही बात मान लेना ठीक नहीं।
लाभ—ईंधन का कोई खर्च नहीं, कोई प्रदूषण नहीं, भोजन के पोषक तत्व नष्ट नहीं होते और एक बार लगाने के बाद चलाने का खर्च लगभग शून्य है।
हानियाँ—यह बादलों वाले दिन तथा रात में काम नहीं करता और भोजन पकने में अधिक समय लगता है।
इसमें तलना अथवा रोटी सेंकना संभव नहीं, क्योंकि उसके लिए आवश्यक उच्च ताप नहीं मिलता; साथ ही इसे बार-बार सूर्य की दिशा में घुमाना पड़ता है।
उत्तर: हाँ, ध्रुवीय क्षेत्रों तथा ऐसे स्थानों में जहाँ वर्ष के अधिकांश दिन बादल छाए रहते हैं अथवा वर्षा होती है, सौर कुकरों की उपयोगिता बहुत सीमित रह जाती है।
पर्यावरणीय परिणाम—जीवाश्मी ईंधन के बढ़ते दहन से वायु प्रदूषण, अम्ल वर्षा तथा भूमंडलीय तापन बढ़ रहा है।
बाँधों के निर्माण से वन तथा कृषि भूमि जलमग्न होती है, पारितंत्र नष्ट होते हैं और लोग विस्थापित होते हैं; नाभिकीय संयंत्रों से विकिरण तथा कचरे का खतरा बढ़ता है।
खपत कम करने के उपाय—आवश्यकता न होने पर बिजली के उपकरण बंद रखिए और LED जैसे दक्ष उपकरण काम में लाइए।
छोटी दूरी के लिए पैदल अथवा साइकिल का उपयोग कीजिए और निजी वाहन के स्थान पर सार्वजनिक परिवहन चुनिए।
उत्तर: इसके साथ सौर जल तापक तथा सौर कुकर जैसे नवीकरणीय साधन अपनाइए—ऊर्जा बचाना भी ऊर्जा उत्पन्न करने जितना ही महत्वपूर्ण है।