ये जलने पर कार्बन, नाइट्रोजन तथा सल्फर के ऑक्साइड छोड़ते हैं, जो वायु प्रदूषण तथा अम्ल वर्षा का कारण बनते हैं।
इनसे निकली कार्बन डाइऑक्साइड हरितगृह प्रभाव बढ़ाकर भूमंडलीय तापन में योगदान करती है।
ये करोड़ों वर्षों में बने हैं और अनवीकरणीय हैं, इसलिए इनके भंडार एक दिन समाप्त हो जाएँगे।
उत्तर: प्रदूषण, भूमंडलीय तापन तथा भंडारों का सीमित होना—ये जीवाश्मी ईंधन की मुख्य हानियाँ हैं।
हमारे पारंपरिक ऊर्जा स्रोत, जैसे कोयला और पेट्रोलियम, सीमित हैं और वर्तमान दर से उपयोग करते रहने पर शीघ्र ही समाप्त हो जाएँगे।
इनके जलने से वायु प्रदूषण, अम्ल वर्षा तथा भूमंडलीय तापन जैसी गंभीर समस्याएँ पैदा होती हैं।
साथ ही जीवन स्तर सुधरने के साथ हमारी ऊर्जा की माँग निरंतर बढ़ती जा रही है।
उत्तर: इसीलिए हमें ऐसे वैकल्पिक स्रोतों की ओर ध्यान देना पड़ रहा है जो नवीकरणीय हों और पर्यावरण को कम हानि पहुँचाएँ।
पहले पवन ऊर्जा से केवल पवनचक्की चलाकर अनाज पीसा जाता था अथवा कुएँ से जल खींचा जाता था; अब पवन ऊर्जा फार्म बनाकर उससे विद्युत उत्पन्न की जाती है।
पहले बहते जल से सीधे जल चक्की चलाई जाती थी; अब नदियों पर ऊँचे बाँध बनाकर जल की स्थितिज ऊर्जा से टरबाइन घुमाए जाते हैं।
दोनों ही सुधारों में मूल विचार यह है कि ऊर्जा को ऐसे रूप में बदल दिया जाए जिसे दूर तक भेजा जा सके, यानी विद्युत में।
उत्तर: इन सुधारों से ऊर्जा का उपयोग कहीं अधिक दक्ष और व्यापक हो गया है।