किसी छड़ चुंबक को कुंडली के पास ले जाकर अथवा उससे दूर ले जाकर, यानी दोनों के बीच आपेक्षिक गति उत्पन्न करके।
चुंबक को स्थिर रखकर कुंडली को ही चुंबकीय क्षेत्र में गति कराकर अथवा घुमाकर।
पास रखी दूसरी कुंडली में बहने वाली धारा को घटाकर, बढ़ाकर अथवा बंद-चालू करके, जिससे पहली कुंडली से जुड़ा क्षेत्र बदल जाए।
उत्तर: इन सभी तरीकों में एक ही बात समान है—कुंडली से जुड़े चुंबकीय क्षेत्र का बदलना, और यही प्रेरित धारा का असली कारण है।
विद्युत जनित्र वैद्युतचुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है।
जब कोई कुंडली चुंबकीय क्षेत्र में घुमाई जाती है तो उसकी भुजाएँ क्षेत्र रेखाओं को काटती हैं और उनसे जुड़ा चुंबकीय क्षेत्र बदलता रहता है।
इसी परिवर्तन के कारण कुंडली में विद्युत धारा प्रेरित हो जाती है।
उत्तर: इस प्रकार जनित्र यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित कर देता है।
दिष्ट धारा वह है जो सदैव एक ही दिशा में प्रवाहित होती है।
उत्तर: इसके स्रोत हैं—शुष्क सेल, बटन सेल, कार की बैटरी तथा dc जनित्र।
प्रत्यावर्ती धारा समान काल-अंतरालों के बाद अपनी दिशा बदलती रहती है।
उत्तर: इसके स्रोत हैं—ac जनित्र तथा विद्युत शक्ति संयंत्रों से घरों तक आने वाली विद्युत आपूर्ति, जो भारत में 220 V और 50 Hz की होती है।