सौर कुकर में सूर्य की किरणों को एक छोटे क्षेत्र पर केंद्रित करके उच्च ताप उत्पन्न करना होता है।
उत्तल दर्पण किरणों को फैला देता है और समतल दर्पण केवल परावर्तित करता है, केंद्रित नहीं।
अवतल दर्पण समांतर किरणों को अपने फोकस पर मिला देता है, जिससे वहाँ ताप बहुत बढ़ जाता है।
उत्तर: इसीलिए सौर कुकर के लिए अवतल दर्पण सर्वाधिक उपयुक्त होता है।
ज्वारीय ऊर्जा के लिए सँकरी खाड़ी के मुहाने पर बाँध बनाना पड़ता है और ऐसी उपयुक्त जगहें बहुत कम हैं।
तरंग ऊर्जा का उपयोग केवल वहीं संभव है जहाँ तरंगें अत्यंत प्रबल हों, और उन्हें पकड़ने वाली युक्तियाँ अभी महँगी हैं।
महासागरीय तापीय ऊर्जा संयंत्र तभी चल सकता है जब सतह तथा 2 किलोमीटर गहराई के जल के ताप में कम से कम 20 °C का अंतर हो।
उत्तर: तीनों में ऊर्जा तो विशाल मात्रा में है, पर उसे दक्षतापूर्वक और सस्ते में निष्कर्षित करने की प्रौद्योगिकी अभी सीमित है।
भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण पृथ्वी के भीतर का पिघला हुआ तप्त मैग्मा ऊपर आकर कुछ स्थानों पर एकत्र हो जाता है, जिन्हें तप्त स्थल कहते हैं।
भूमिगत जल इन तप्त स्थलों के संपर्क में आकर भाप बन जाता है और दाब के कारण ऊपर की ओर धकेला जाता है।
इस भाप को पाइपों द्वारा बाहर निकालकर टरबाइन घुमाया जाता है, जिससे विद्युत उत्पन्न होती है।
उत्तर: पृथ्वी के भीतर की इसी ऊष्मा से प्राप्त ऊर्जा भूतापीय ऊर्जा कहलाती है; न्यूज़ीलैंड तथा अमेरिका में ऐसे संयंत्र काम कर रहे हैं।
बहुत थोड़ी मात्रा के नाभिकीय ईंधन से बहुत अधिक ऊर्जा मिल जाती है—यूरेनियम का एक परमाणु कार्बन के एक परमाणु की तुलना में करोड़ों गुना अधिक ऊर्जा देता है।
इससे जीवाश्मी ईंधन जैसा वायु प्रदूषण नहीं होता।
एक बार संयंत्र लग जाने पर वह लंबे समय तक लगातार विद्युत देता रहता है।
उत्तर: बढ़ती ऊर्जा माँग के सामने यह एक महत्वपूर्ण विकल्प है, यद्यपि विकिरण तथा कचरे के निपटान के जोखिम भी गंभीर हैं।